बेखुदी ले गयी कहाँ हम को देर से इंतज़ार है अपना रोते फिरते हैं सारी-सारी रात अब यही रोज़गार है अपना दे के दिल हम जो हो गए मजबूर इस में क्या इख्तियार है अपना कुछ नही हम मिसाले-अनका लेक शहर-शहर इश्तेहार है अपना जिस को तुम आसमान कहते हो सो दिलों का गुबार है अपना
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