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बेखुदी ले गयी कहाँ हम को

बेखुदी ले गयी कहाँ हम को देर से इंतज़ार है अपना रोते फिरते हैं सारी-सारी रात अब यही रोज़गार है अपना दे के दिल हम जो हो गए मजबूर इस में क्या इख्तियार है अपना कुछ नही हम मिसाले-अनका लेक शहर-शहर इश्तेहार है अपना जिस को तुम आसमान कहते हो सो दिलों का गुबार है अपना

कहा मैंने कितना है गुल

कहा मैंने कितना है गुल का सबात कली ने यह सुनकर तब्बसुम किया जिगर ही में एक क़तरा खूं है सरकश पलक तक गया तो तलातुम किया किसू वक्त पाते नहीं घर उसे बहुत 'मीर' ने आप को गम किया

आए हैं मीर मुँह को बनाए

आए हैं मीर मुँह को बनाए जफ़ा से आज शायद बिगड़ गयी है उस बेवफा से आज जीने में इख्तियार नहीं वरना हमनशीं हम चाहते हैं मौत तो अपने खुदा से आज साक़ी टुक एक मौसम-ए-गुल की तरफ़ भी देख टपका पड़े है रंग चमन में हवा से आज था जी में उससे मिलिए तो क्या क्या न कहिये 'मीर' पर कुछ कहा गया न ग़म-ए-दिल हया से आज