Skip to main content

Posts

Showing posts with the label Ahmad Faraz

अहमद फराज

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती ये ख़ज़ाने तुझे मुम्किन है ख़राबों  में मिलें तू ख़ुदा है न मेरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा दोनों इंसाँ हैं तो क्यों इतने हिजाबों में मिलें ग़म-ए-दुनिया  भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें आज हम दार पे खेंचे गये जिन बातों पर क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें अब न वो मैं हूँ न तू है न वो माज़ी  है "फ़राज़" जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों  में मिलें

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते-जाते वरना इतने तो मरासिम थे कि आते-जाते शिकवा-ए-जुल्मते-शब से तो कहीं बेहतर था अपने हिस्से की कोई शमअ जलाते जाते कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वरना हम भी पा बजोलां ही सहीं नाचते-गाते जाते उसकी वो जाने, उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ से तो निभाते जाते

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो

बुझी नज़र तो करिश्मे भी रोज़ो शब के गये के अब तलक नही पलटे हैं लोग कब के गये करेगा कौन तेरी बेवफ़ाइयों का गिला यही है रस्मे ज़माना तो हम भी अब के गये मगर किसी ने हमे हमसफ़र नही जाना ये और बात के हम साथ साथ सब के गये अब आये हो तो यहाँ क्या है देखने के लिये ये शहर कब से है वीरां वो लोग कब के गये गिरफ़्ता दिल थे मगर हौसला नही हारा गिरफ़्ता दिल हैं मगर हौसले भी अब के गये तुम अपनी शम्ऐ-तमन्ना को रो रहे हो "फ़राज़" इन आँधियों मे तो प्यारे चिराग सब के गये

​ फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं​

​ फ़राज़ अब कोई सौदा कोई जुनूँ भी नहीं​; ​ मगर क़रार से दिन कट रहे हों यूँ भी नहीं​;​ ​ ​ लब-ओ-दहन भी मिला गुफ़्तगू का फ़न भी मिला​; ​ मगर जो दिल पे गुज़रती है कह सकूँ भी नहीं​; ​ मेरी ज़ुबाँ की लुक्नत से बदगुमाँ न हो ​;​ जो तू कहे तो तुझे उम्र भर मिलूँ भी नहीं​; ​ ​​ "फ़राज़" जैसे कोई दिया तुर्बत-ए-हवा चाहे है​; ​​ ​ तू पास आये तो मुमकिन है मैं रहूँ भी नहीं​।

कठिन है राहगुज़र

कठिन है राहगुज़र थोड़ी दूर साथ चलो; बहुत बड़ा है सफ़र थोड़ी दूर साथ चलो; तमाम उम्र कहाँ कोई साथ देता है; मैं जानता हूँ मगर थोड़ी दूर साथ चलो; नशे में चूर हूँ मैं भी तुम्हें भी होश नहीं; बड़ा मज़ा हो अगर थोड़ी दूर साथ चलो; ये एक शब की मुलाक़ात भी ग़नीमत है; किसे है कल की ख़बर थोड़ी दूर साथ चलो; अभी तो जाग रहे हैं चिराग़ राहों के; अभी है दूर सहर थोड़ी दूर साथ चलो; तवाफ़-ए-मन्ज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है; 'फ़राज़' तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो।