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हंगामा है क्यूँ बरपा

हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है वां दिल में कि दो सदमे,यां जी में कि सब सह लो उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है -अकबर इलाहाबादी

बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ

बेपर्दा नज़र आईं जो चन्द बीवियाँ ‘अकबर’ ज़मीं में ग़ैरते क़ौमी से गड़ गया पूछा जो उनसे -‘आपका पर्दा कहाँ गया?’ कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों की पड़ गया -अकबर इलाहाबादी

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार

दुनिया में हूँ दुनिया का तलबगार नहीं हूँ बाज़ार से गुज़रा हूँ खरीदार नहीं हूँ ज़िंदा हूँ मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीँ बाकी हर चंद के हूँ होश में, हुशियार नहीं हूँ - अकबर इलाहाबादी

हाले दिल सुना नहीं सकता

हाले दिल सुना नहीं सकता लफ़्ज़ मानी को पा नहीं सकता इश्क़ नाज़ुक मिज़ाज है बेहद अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता होशे-आरिफ़ की है यही पहचान कि ख़ुदी में समा नहीं सकता पोंछ सकता है हमनशीं आँसू दाग़े-दिल को मिटा नहीं सकता मुझको हैरत है इस कदर उस पर इल्म उसका घटा नहीं सकता -अकबर इलाहाबादी

भरी है अंजुमन लेकिन

भरी है अंजुमन लेकिन किसी से दिल नहीं मिलता, हमीं में आ गया कुछ नुक्स, या कामिल नहीं मिलता।  पुरानी रोशनी में और नई में फ़र्क़ इतना है, उसे किश्ती नहीं मिलती इसे साहिल नहीं मिलता।   [(अंजुमन = महफ़िल) (कामिल = पूर्ण योग्य) (साहिल = किनारा)] -अकबर इलाहाबादी

ये दिल लेते ही शीशे की तरह

ये दिल लेते ही शीशे की तरह पत्थर पे दे मारा, मैं कहता रह गया ज़ालिम मेरा दिल है, मेरा दिल है । हज़ारों दिल मसल कर पाँव से झुँझला के फ़रमाया, लो पहचानो तुम्हारा इन दिलों में कौन सा दिल है । -अकबर इलाहाबादी

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते

आँखें मुझे तल्वों से वो मलने नहीं देते, अरमान मेरे दिल का निकलने नहीं देते। ख़ातिर से तेरी याद को टलने नहीं देते, सच है कि हमीं दिल को संभलने नहीं देते। किस नाज़ से कहते हैं वो झुंझला के शब-ए-वस्ल, तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते। परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले, क्यों हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते। हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना, दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते। दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त, हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते। गर्मी-ए-मोहब्बत में वो है आह से माने, पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते। -अकबर इलाहाबादी

हँस के दुनिया में मरा कोई, कोई रो के मरा

हँस के दुनिया में मरा कोई, कोई रो के मरा, ज़िन्दगी पाई मगर उसने, जो कुछ हो के मरा। जी उठा मरने से वह, जिसकी ख़ुदा पर थी नज़र, जिसने दुनिया ही को पाया था, वह सब खो के मरा। था लगा रूह पै, ग़फ़लत से दुई का धब्बा, था वही सूफ़िये-साफ़ी जो उसे धो के मरा। [(ग़फ़लत = असावधानी, बेपरवाही ) , (सूफ़िये-साफ़ी = ब्रह्मज्ञानी/ शुद्ध करने वाला)] -अकबर इलाहाबादी

तहसीन के लायक

तहसीन के लायक तिरा हर शेर है 'अकबर', अहबाब करें बज़्म में अब वाह कहाँ तक । -अकबर इलाहाबादी [(तहसीन = प्रशंसा), (अहबाब = दोस्त, मित्र), (बज़्म = महफ़िल, सभा)]

नहीं कुछ इसकी पुर्सिश

नहीं कुछ इसकी पुर्सिश उल्फ़ते-अल्लाह कितनी है, यही सब पूछते हैं आपकी तनख़्वाह कितनी है । -अकबर इलाहाबादी [(पुर्सिश = पूछताछ), (उल्फ़ते-अल्लाह = ईश्वर प्रेम)]